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MADHYA PRADESHI

SHIVJI KI BARAT

Shivraj’s cabinet more or less resembles Shiv ji Ki barat – with so many odd balls. Narottam Mishra’s election has been annulled on the charges of paid news; Antar Singh Arya has been charged with murder of Congress Mla – both these gentlemen shamelessly defy the authorities and continue as ministers. Then there is Kusum Mehdele whose insensitivity is well known– as exemplified by her kicking poor young children; the agriculture minister Gauri Shankar Bisen is a motor mouth ; Sanjay Pathak -the leading mining baron (mafia) of the state was ironically made the convener of Shivraj’s Narmada Yatra; Rustom Singh is infamous for his police style functioning; Gopal Bhargava is given to gimmicks besides backing his recalcitrant son; Vijay Shah has foot in the mouth disease. Not merely serving but even the ex- ministers are a nuisance Babulal Gaur continuously asks embarrassing questions in the Vidhan Sabha; Kailash Vijayvargiya loses no opportunity to pass snide remarks; Kamal Patel picks up cudgels against his own administration; Anup Mishra barely got acquitted in a murder case. No wonder with such a motley group Shivraj has effectively centralised all authority in his own office leaving the cabinet deal merely with routine stuff.

कृषि का गड़बड़झाला

कई वर्षों से कृषि कर्मण पुरस्कार कबाड़ रही मध्यप्रदेश सरकार फिलहाल किसानों के रोष का शिकार हो रही है. कारण यह है कि विगत एक वर्ष में तीसरी बार किसानों को अपनी फसल सड़कों पर फेंकनी पड़ी है.पहले संतरा फिर टमाटर और अब प्याज. कहीं न कहीं यह सरकार की नीतियों में दूरदर्शिता की कमी को दर्शाता है.बंपर फ़सल होने का अनुमान तो बोनी से ही लग जाता है.ऐसे में कृषि विभाग क्या कर रहा था. इस मामले में ढील के राजनैतिक दुष्परिणाम संभावित थे -और हुए.

प्रदेश में कृषि का विकास बेतरतीब ढंग से हुआ – सही अनुपात मैं बाग़वानी एवं पशुपालन का विकास नहीं हुआ. न ही सहकारिता में बढोतरी हुई और न ही कृषि आधारित उद्योग लगे. सिंचाई व्यवस्था में भी अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई – तिस पर नकली बीज एवं खाद ने स्थिति बद से बदतर कर दी. सवाल सिर्फ आय बढ़ाने का नहीं है अपितु किसानों और अन्य वर्गों की आय के बीच बढ़ती खाई का भी है. आंकड़ों की बाजीगरी तो अपनी जगह है किन्तु यदि १० वर्षों से लगातार १० प्रतिशत से अधिक वृद्धि ( कुछ वर्षों मैं तो २० प्रतिशत ) मान ली जाय तो बाजार का एक समय के बाद ढहना स्वाभाविक ही था.यह दर्शाता है कि सोच समग्र नहीं थी एवं दूरदर्शिता का नितांत आभाव था.

भविष्य में २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य यदि प्राप्त भी हो जाता है तो भी मसला हल होने वाला नहीं है. कारण यह कि दो गुना होने के बाद भी वह राष्ट्रीय औसत से बहुत काम रहेगी. अतः आवश्यकता है कि कृषि पर एक श्वेत पत्र जारी किया जाए तथा साथ ही एक दृष्टि पत्र भी तैयार किया जाए ताकि भूत कि गलतियों से सीख लेते हुए भविष्य की चुनौतियों का सामना किया जा सके .

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